ऐ दिसम्बर
ऐ दिसम्बर, सुन…
तू जा तो रहा है, पर ज़रा ठहर,
क्या मेरी सारी उदासियाँ
अपने साथ ले जाएगा?
वो यादें भी,
जो हर पल मुझे
उसके और क़रीब ले जाती हैं…
माना कि तुझसे जुड़े हैं कई लम्हे,
कुछ खट्टे, कुछ मीठे,
कुछ तीखे, कुछ चटपटे,
पर फिर भी,
तेरा यूँ चले जाना
दिल को बहुत खल रहा है,
क्योंकि डर है,
कहीं तू चला गया
और यादें यहीं रह गईं…
मेरे दिल के किसी कोने में दफन तो....
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें