ऐसा भी हो कभी....


 ऐसा भी हो कभी कि दिसम्बर की किसी सर्द सुबह में,

छज्जे पर खडी़ मखमली धूप में,

मैं गीले बाल अपने सुखा रही हूं और अनायास ही गली में मुझे तेरा दिदार हो जाए,

तुम्हारी नजरें उठे और मेरी नजरों से चार हो जाए,

उफ्फ वह सुबह भी क्या सुबह होगी,

तुम्हारी निगाहों से बातें करती निगाहें मेरी,

कुछ हया तो कुछ संकोच से सकुचाते लव मेरे,

रूबरू होकर तुमसे जो न हो सकती है बातें कभी

निगाहों ने उन बातों को भी करने का ज्यो लिया हो जिम्मा,

हठी निगाहें बेसब्र मन, कर रही हो जैसे ... 

कभी खत्म न होने वाली बातें,

काश कभी ऐसा भी हो...!!

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